नृत्य देखना
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन भगवान श्रीचक्रधर स्वामीजी चांगदेव मंदिरके पिछले हिस्सेमें बैठे थे। उतनेमें एक नर्तक मंडली वहाँ नृत्य करने आ पहुँची। उनमेंसे एक स्त्री वस्त्र बदलने जब मंदिरके पीछे आयी, तो उसने वहाँ भगवानको विराजमान देखा। वह भगवानके असीम सौंदर्यपर मनोमुग्ध हो आत्मविस्मृत-सी हुई निर्निमेष दृष्टिसे उनकी ओर टुकुरटुकुर ताकती रही। जब काफी देर बाद भी वह वापस न आयी, तो दूसरे नर्तक भी उसे खोजते खोजते वहाँ जमा हो गये और भगवानके देदीप्यमान सौंदर्यको देख अपनी सुधबुध खो बैठे। उनको अपने पास एकत्रित हुआ देख भगवानने उनसे कहा, 'आप सब अंदर चलकर नृत्यकी तैयारी करो, हम वहीं आते हैं।'
भगवानके इन शब्दोंसे उनकी तंद्रा टूटी, तो उन्होंने अपनेआपको विमोहितसा पाया। उनकी आज्ञानुसार वे सब मंदिर में जाकर नृत्यकी तैयारीमें लग गये। थोड़ी देर बाद भगवान भी मंदिरमें जा पहुँचे। सबने भगवानको अपनीअपनी कला दिखायी। भगवानने सबकी कलाकी भूरिभूरि प्रशंसा की तथा उन्हें प्रसाद रूप में पान खिलाये। जानेसे पूर्व उन्होंने कहा, 'महाराज, आपकी श्रीमुर्तिके दर्शनसे हमें बड़ा आनंद प्राप्त हुआ है। ऐसा आनंद, जिसको हम शब्दोंमें व्यक्त नहीं कर सकते। आजकल तो कलाका कोई सच्चा पारखी है ही नहीं। आपने हमें जो प्रोत्साहन दिया है, उससे भी हमें बड़ा बल मिला है।'
एक दूसरी नर्तकीने आगे बढ़कर प्रार्थना की, 'महाराज, यदि आपको कष्ट न हो, तो भोजन करने आप हमारे यहाँ ही चलें।'
प्रत्युत्तरमें भगवानने कहा, 'हमें आज कहीं अन्यत्र आमंत्रण है, इसलिये तुम्हारे साथ नहीं चल सकते। हाँ, फिर कभी तुम्हारे अनुरोधको हम जरूर पूर्ण करेंगे।'
सबके चले जानेपर भगवान भी अपने निवास स्थानपर लौट आये।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?
स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।
सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।
श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreभगवान श्री कृष्ण जी को छप्पन भोग ...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है। इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है। यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है।
अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया:
ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी। अर्थात् बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे। जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया।
आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ। भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया।
गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग:
श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों। श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी। व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया।
छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं। उस कमल की तीन परतें होती हैं…प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह” और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं। इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है। 56 संख्या का यही अर्थ है।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
Read moreकुम्भार बोला मुझे चौरासी लाख यानि...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
प्रभु श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ बहुत-सी लीलायें की हैं। श्री कृष्ण गोपियों की मटकी फोड़ते और माखन चुराते और गोपियाँ श्री कृष्ण का उलाहना लेकर यशोदा मैया के पास जातीं। ऐसा बहुत बार हुआ।
एक बार की बात है कि यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी। जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे।
भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे। कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था। लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं। तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि ‘कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है। मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है। भैया, मुझे कहीं छुपा लो।’
तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया। कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी – ‘क्यूँ रे, कुम्भार! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या?’
कुम्भार ने कह दिया – ‘नहीं, मैया! मैंने कन्हैया को नहीं देखा।’ श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे। मैया तो वहाँ से चली गयीं। अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं – ‘कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो।’
कुम्भार बोला – ‘ऐसे नहीं, प्रभु जी! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’ भगवान मुस्कुराये और कहा – ‘ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ। अब तो मुझे बाहर निकाल दो।’
कुम्भार कहने लगा – ‘मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा।’
प्रभु जी कहते हैं – ‘चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ। अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।’
अब कुम्भार कहता है – ‘बस, प्रभु जी! एक विनती और है। उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
भगवान बोले – ‘वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो?’
कुम्भार कहने लगा – ‘प्रभु जी! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है। मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो।’
भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया।’
प्रभु बोले – ‘अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो।’
तब कुम्भार कहता है – ‘अभी नहीं, भगवन! बस, एक अन्तिम इच्छा और है। उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है – जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे। बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा।’
कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया।
फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया। अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये।
जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे।
लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर। कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते।
।। हरी व्यापक सर्वत्र समाना ।।
।। प्रेम से प्रकट होई मैं जाना ।।
मोहन प्रेम बिना नहीं मिलता, चाहे कोई कर ल्यो कोटि उपाय।
करोड़ों उपाय भी चाहे कोई कर लो तो प्रभु को प्रेम के बिना कोई पा नहीं सकता।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreदंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमान...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
🌸 दंडवत या शब्दाचा अर्थ काठि प्रमाने संपुर्ण शरणागती
🌸 दंडवत हा शब्द प्राचीन ग्रंथ रचनेत सुद्धा आला आहे
🌸 दंडवत दोन प्रकारे केल्या जातो ,एक वाचिके कायाप्रणीत कंबरेपासुन वाकुन दंडवत बोलने
🌸 दुसरा दंडवत संपुर्ण शरीर जमीनीवर काठिवत् टाकने
🌸 लीळाचरीत्रात बाईसा राशी दंडवत् घालत होत्या स्वामींच्या दर्शनाला आलेले भक्तजन पाच दंडवत घालुन श्रीचरणी लागत, स्वामी चांगदेव भटाला रिद्दपुरला गेल्यावर घाला घाला दंडवत म्हटले
🌸 आपण सुद्दा स्थानाला गेल्यावर प्रथम बाहेर पाच दंडवत घालुन त्या स्थानाची लीळा आठवावी,नंतर हात सोवळे करुण स्थान वंदन करावे पुनश्च संपुर्ण विधी झाल्यावर दंडवत घालुन मंदिराच्या बाहेर पडावे
🌸 दंडवत घातल्याने जीव स्वरुपी आलेला आसळगै ,पातलेपणा निघुन जातो व साधक विधी करण्यास दक्ष होतो
🌸 दंडवताने रोग नाहिसे होतात ,कारण दंडवत हा एक ऊत्तम व्यायाम आहे,वाय,कफ,पित्त बाधत नाहित
🌸 दंडवत घालताना लीळाचरीत्रातील दंडवताच्या लिळा आठवल्याने जीव स्वरुपाची योग्यता वाढते ईत्यादि अनेक फायदे आहेत
🌸 परमेश्वराच्या सर्व साधकाने एकमेकांना भेटल्यावर वाकुन ,नम्रतेने ,श्रद्धेने आवडिने दंडवत केला तर स्वामी भेटलेयाचे गोमटे होते
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreप्रातः काल का पूजा अवसर हो जाने क...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन भगवान जी प्रातः काल का पूजा अवसर हो जाने के बाद छिन्नस्थली विहरण के लिए गए! वहां से सिंह नारायण के मंदिर में आकर आसन पर बैठे! इतने में ही इन्द्रभट्ट आए और सम्मुख बैठ गए! उन्हें भोजन के लिए नियंत्रण देना था किंतु याद ही नहीं रहा! आसमान में बादल देखते ही महाराज ने संकेत किया कि इन्द्रभट्ट तुम शीघ्र अपने घोगर गांव चले जाओ अन्यथा भीग जाओगे!
इन्द्रभट्ट बचते हुए जैसे ही गांव पहुंचे वैसे ही बारिश शुरू हो गई! इधर भक्तजन कपड़े का चंदोवा बना कर भगवान जी के ऊपर लगा चलने लगे! कभी जानबूझ कर लीला के हेतु से महाराज पीछे रह जाते तो कभी आगे निकल आते! जब तक भक्तजन चांदोवा आगे पीछे करते तब तक महाराज भीग जाते! इस प्रकार उनके वस्त्र गीले देख रेइनायक के घर से दूसरे वस्त्र मंगवाए गए! सभी भक्तों ने भी राजमठ वापिस लौट कर दूसरे वस्त्र धारण किए!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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