लाहीभट्टकी श्रवणजिज्ञासा
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
एक दिन लाहीभट्ट श्रीचक्रधर स्वामीजीके दर्शनोंको आया। प्रणाम करनेके उपरांत उसने भगवानसे कुछ सुननेकी प्रार्थना की। भगवान बोले, ' लाहीभट्ट, अपने मनमें धारण किये देवताविषयक सकाम कर्मोंको भुला देनेपर ही तुम हमारे उपदेशके वास्तविक अधिकारी बन सकते हो। उनके रहते ईश्वरीय ज्ञानकी प्राप्ति दुर्लभ है।'
लाहीभट्ट बोला, 'महाराज! देवताभक्त ईश्वरीय ज्ञानको धारण क्यों नही कर सकता ? उसमें भी तो कर्मकांड पर अटूट श्रद्धा रहती है।'
भगवानने समझाते हुए कहा, 'भट्ट! कोरा कर्मकांड मुक्ति नहीं दिला सकता। उससे तो केवल देवताओंके सुखफल ही प्राप्त हो सकते हैं। ईश्वरीय ज्ञानके लिये तो मनुष्यको एकनिष्ठ होना परम आवश्यक है ; क्योंकि जैसे एक मनुष्यके ठहरने पर उस स्थान पर दूसरा मनुष्य नहीं ठहर सकता, वैसे ही देवताविषयक अथवा सांसारिक कामनाओंसे ठसाठस भरे हुए हृदयमें ईश्वरीय ज्ञान चिरंतन कालतक ठहर नहीं सकता।'
सूत्र : वि. बाइः बिढारावरि काइ बिढारु असे ।।२६४ ।।
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
जय चक्रपाणि महाराज जी
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreश्री गोविन्द प्रभु महाराज जी के द...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
गोविन्द प्रभु भगवान जी के अवतारोत्सव पर हम जितने पदार्थ बनने में सक्षम है उतने पदार्थ बना का प्रभु जी को को भोग लगाना चाहिए।
1 - लाख की भाकर, गुड़ की रोटियां, दलिया
2 - दही दूध और माखन, श्री खंड, गुलाब जामुन
3- पकोड़े (बुड़ुदे), धिडरे (बेसन से बना हुआ पुडा), काजू
4 - गुड़, गुड़ और भुने चने, कच्चे ज्वार के दाने
5 - देसी घी, मक्खन, गुड़ और देसी घी से बनी सेवइयां
6 - मीठी ककड़ी, दही भल्ले, खीर
7 - बैंगन की सब्जी, साग
8 - तरबूज, बेर, संतरे, आम का रस
9 - आउसा जी का प्रसिद्ध हलवा
इत्यादि पदार्थ भगवान जी को अच्छे लगते थे।
🙏 जय श्री कृष्ण 🙏
Read moreजब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची | उ...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
जब महादाईसा जी वाराणसी पहुंची तब क्या देखती हैं कि यहां का पानी भी अन्य स्थानों की तरह ही है! कोई विशेष नहीं! बहुत पछतावा कर दादोस के कारण दुखी हो रही थी! मन को समझा कर उन्होंने गंगा में स्नान किया! सबसे पहले दादोस को तिलांजलि दी! फिर अपने परिवार और गोत्र को भी तिलांजलि दी! इसके बाद स्नान कर बाजार आई और अत्यंत दुर्बल नंगे व्यक्ति को भोजन करवाया! उस व्यक्ति को अधिक भूख लगी थी तो वह अतिरिक्त दो लोगों का भोजन भी खा गया! उसके जाने के बाद महादाईसा जी रिद्धपुर के लिए निकली!
यहां से भगवान की ने बाईसा माताजी और नागदेव की को भी परमेश्वर पुर भेजा हुआ था! वे श्री गोविंद प्रभु जी के दर्शन कर वापिस श्री चक्रधर स्वामी जी के पास चलपड़े! भगवान से उन्हें माईतया के घर भेंट हुई!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreज्ञान परम्परा
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
गणपति मठ के बरामदे में बैठे स्वामी जी से महदाइसा ने साष्टांग दंडवत प्रणाम कर विनम्रता से पूछा कि आप जिस ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन करते हैं वह कब से आरम्भ हुआ और इसका आदि कारण कोन है?
स्वामी जी धीरे से मुस्कराये और बोले कि महदाइसा यह समझो कि सृष्टि के साथ साथ ही ज्ञान परम्परा का आरम्भ होता है। इस लिये ज्ञान परम्परा को सनातन भी कहा गया है। हमारी ज्ञान परम्परा के आदि कारण चतुर्युगी भगवान श्री दत्तात्रेयप्रभुजी हैं। उन्होनें त्रेता युग में अवतार धारण किया था। वे चारों युगों में विद्यमान रहते हैं। आज भी सैह्याद्री पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे है। जीवों को ज्ञान प्रदान कर उनक उध्दार करना उनकी प्रवृति है। सृष्टि की ज्ञान परम्परा के वे आदि कारण माने जाते हैं। उन्ही के द्वारा ज्ञान की जाह्नवी चारों युगों में प्रवाहित होती रहती है।
सैह्याद्री पर्वत पर श्री दत्तात्रयेप्रभु ने व्याघ्रवेष में दर्शन देकर द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को ज्ञानशक्ति प्रदान की। कालान्तर में भगवान श्री गेविन्द प्रभु ने द्वारावतीकार श्रीचांगदेवराऊल को निमित बनाकर उनसे ज्ञानशक्ति स्वीकार की। और भगवान गोविन्दप्रभु को निमित बनाकर हमने रिद्धपुर में ज्ञानशक्ति स्वीकार की। इस तरह ज्ञान की परम्परा अनवरत रूप से चलती रहती है। समय समय पर जब भी ज्ञान की परम्परा लुप्त प्राय: हो जाती है, तब तब पुन: सृष्टि में परमेश्वर अवतरित होते हैं और ज्ञान परम्परा को आगे बनाये रखने का प्रयास किया जाता है।
श्री दत्तात्रयेप्रभुजी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreज्ञान शक्ती स्वीकार
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
इधर श्री चक्रपाणी माहुर को आ गये, शके 1080 (इ.स.1158) उमर के 30 वे वर्ष माहुर मेँ श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने के लिये, क्योकी भगवान को अवतार शक्ती स्वीकार कार्य करना था। लोग माहुर के गड (शिखर) पर चढणे लगे, श्री चक्रपाणी भी यात्रीओँ के पीछे अंतर रखकर चढ रहे थे, तभी अचानक एक जाली मेँ से (श्री दत्तात्रेय प्रभु) वाघ के रुप मेँ आरोगना करके आ गये, यात्रीगण इधर उधर भागने लगे पर श्री चक्रपाणी महाराज वही एक खडक पर बैँठ गये, और श्री चक्रपाणी प्रभु श्री दत्तात्रेय प्रभु के (वाघ) सामने बैठ कर नमस्कार कीया, तभी वाघने (श्री दत्तात्रेय प्रभु) श्री चक्रपाणी के सर पर पंजा रखकर उभय शक्ती प्रदान की, श्री चक्रपाणी राऊळ ने ज्ञान शक्ती का स्वीकार किया उसमेँ “पराशक्ती” के आच्छादन करके अवर शक्ती के कार्य सुरु कीये।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
Read moreउत्तरार्ध लीला क्रमांक 206 | लीला...
🙏 दंडवत प्रणाम 🙏
जय श्री चक्रधर स्वामी जी
किसी दिन सुबह का पूजा अवसर हो जाने के बाद भगवान जी छिन्नस्थली स्थान की तरफ गए! गुफा में आकर महाराज ने नाथोबा और नागदेव जी के सिर आपस में मिला दिए और स्थिति सुख अनुभव करवाया! स्वयं वापिस लौट आए तो बाईसा माताजी ने उन दोनों के विषय में पूछा! तब भगवान जी ने कहा, वे दोनों आपस में भिड़े हुए हैं! जाओ उन्हें ले आओ! बाईसा माताजी नाथोबा और नागदेव जी को बुला लाई! उन दोनों ने आकर स्थिति सुख का आनंद लेने के विषय में भगवान जी को बताया! स्वामी जी कहने लगे, अभी तो हमसे प्राप्त हुआ स्थिति सुख आपको इतना आनंद दे रहा है तो सोचो हमारा परमानंद आपको कितना प्रफुल्लित करेगा! इसका आपको आभास भी नहीं है!
बोलिए श्री चक्रधर स्वामी जी की जय
।। श्रीचक्रधरार्पणम् ।।
🙏 जय श्री कृष्ण जी 🙏
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